हल्ला बोल कस कर बोल

हल्ला बोल कस कर बोल

      हल्लाबोल

शिक्षा का गन्दा व्यापार आज जो चल रहा है और सरकार की कोई लगाम नही उस पर।
तकनीकी संस्थानों में रोज़गार देने के नाम पर फ़र्ज़ी कम्पनीज को रोज़गार मेला में बैठा कर विद्यार्थियों की भावनाओं से खेलना उनके सपनों को रौंद कर उस पर अपनी झूठी शख्सीयत की कहानी जड़ना आखिर कहाँ तक जायज़।।।

यह दिखा रहा है कि फर्श पर गेंहू बोने पर बटोर जा सकता है लेकिन खेत में डालने पर वह अंकुरित होकर फल देने लगता है, आप उसे बटोर नही सकते । 
दिन दूनी रात चौगुनी गति से वह प्रतिफल देगा।
यह एक ऐसी भूल है जिसका फल आने वाले काफी समय तक भुगतना पड़ेगा । निजी फायदे के चक्कर में भावनाएं भड़का देना आसान है लेकिन उस गुबार को रोकना मुश्किल है । 
इन्हें शायद खुदपर कुछ ज्यादा ही भरोसा था । 
खैर.. मार्केटिंग बेस्ड राजनीति को नमन और अति आत्मविश्वासी नेताओं को नमन ..

मेरा देश बहुत तेजी से बदल रहा है, पता नही किधर - किधर बढ़ रहा है।।